मदर टेरेसा पर भाषण

नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला मदर टेरेसा जिन्होंने अपने जीवन का अधिकतर समय गरीब, बीमार, लाचार और असहाय लोगों की सेवा करने में व्यतीत किया.

मदर टेरेसा की इस प्रकार की निःस्वार्थ सेवा भाव से कई लोग प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़े. वो अपने जीवन के अंतिम समय तक लोगों की सेवा करती रही शायद इसी वजह से पूरा विश्व उनको आज भी याद करता है. उनको 1980 में भारत सरकार के द्वारा भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.

मदर टेरेसा को लोगों की सेवा के दौरान अपने जीवन में कई ख़राब परिस्थितियों से गुजरना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. ऐसे व्यक्तित्व के बारे में विश्व के हर व्यक्ति को जानने की जरूरत है ताकि उनके जीवन से कुछ सीख ली जा सके.  

इस लेख में हमने मदर टेरेसा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए एक भाषण तैयार किया है जो आपको उनके जीवन के बारे में गहराई से जानने में मदद करेगा. 

मदर टेरेसा पर भाषण (Mother Teresa Speech Hindi)

Mother Teresa Speech Hindi

परम आदरणीय प्राचार्य महोदय, शिक्षक गण और यहाँ उपस्थित सभी छोटे-बड़े भाइयों और बहनों को मेरा प्रणाम.

आज मैं मदर टेरेसा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के लिए आपके समक्ष खड़ा हूँ जिन्होंने अपने पूरे जीवन काल में दुसरो की सेवा करना ही अपना कर्तव्य समझा और कई लोगो के जीवन में उजाला लेकर आई.

आज के समय में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने स्वार्थ को छोड़ कर लोगो की सेवा करे हर कोई जो कुछ भी करता है अपने मतलब के लिए करता है लेकिन मदर टेरेसा इन सब विचारो से परे थी.

मदर टेरेसा भारतीय मूल की नहीं होते हुए भी भारत के लोगों से इस प्रकार जुड़ गयी जैसे उनका इस मिट्टी से कई जन्मो का नाता हो. उन्होंने मानवता के धर्म को सबसे ऊपर रखा और हर व्यक्ति से प्रेम किया दुःख में उनके साथ खड़ी रही.

मदर टेरेसा का जन्म और शुरुआती जीवन

मदर टेरेसा का असली नाम अगनेस गोंझा बोयाजिजू है उनका जन्म 26 अगस्त 1910 को मैसेडोनिया के स्कोप्जे नामक शहर में हुआ था.

उनके पिता का नाम निकोला बोयाजू था और माता का नाम द्राना बोयाजू है. मदर टेरेसा के अलावा उनके परिवार में एक भाई और एक बहन भी थे और वो सबसे छोटी थी.

वो जब 9 वर्ष की थी तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी. उनकी माँ द्राना ने ही अपने तीनो बच्चों का पालन पोषण किया था.

पिता की मृत्यु के बाद उनके परिवार को आर्थिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ा. 

उनका पूरा परिवार चर्च में जाकर लोगों की मदद करता था. अगनेस पढाई के साथ संगीत की भी बहुत शौकीन थी और चर्च में भी वो गाना गाने जाया करती थी.

बहुत ही कम उम्र में वो धार्मिक रूप से लोगो की सेवा करने लगी और इसे अपने जीवन का एक अंग बनाने का निश्चय किया.

मात्र 18 साल की उम्र में मदर टेरेसा ने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ से जुड़ कर अपना आगे का जीवन एक नन के रूप में लोगों की सेवा में व्यतीत करने का फैसला किया. वो अंग्रेजी सीखने के लिए आयरलैंड गयी.

मदर टेरेसा का भारत आगमन 

मदर टेरेसा अपने साथियों के साथ 1929 में भारत आई और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग शहर के मिशनरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाया. इसके बाद वो कलकत्ता में स्थापित संत मैरी स्कूल में बंगाल के गरीब बच्चों को इतिहास और भूगोल पढ़ाने लगी.

मदर टेरेसा हिंदी और बंगाली की भी अच्छी जानकार थी इसलिए उनको पढ़ाने में ज्यादा समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता था. कई वर्षों तक उन्होंने पूरी लगन और के साथ काम किया और 1944 में वो संत मैरी स्कूल की प्रिंसिपल बनी.

कलकत्ता में रहते हुए उन्होंने अपने आस पास कई गरीब, बीमार और लाचार लोगों को देखा जो अपना इलाज कराने में सक्षम नहीं थे. लोगों के पूरे परिवार अनेकों बीमारियों की चपेट में आये हुए थे.

एक बार उनको ऐसा एहसास हुआ कि येशु ने खुद आकर उन्हें अध्यापक का काम छोड़कर कलकत्ता में रहने वाले गरीब और बीमार लोगों की मदद करने की सलाह दी. कुछ दिनों के बाद साल 1948 में जनवरी महीने में उन्होंने अध्यापक का कार्य छोड़ दिया और लोगों की सेवा करने में लग गयी.

गरीब लोगों का वो खुद मुफ्त में इलाज करना चाहती थी इसके लिए वो पटना गई और नर्सिंग की ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वापस आई और लोगों की सेवा करने लगी.

वो एक गरीब और अनाथ बच्चों के आश्रम से जुड़ी और वहाँ अपनी सेवा देने लगी. इस दौरान उनको भी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

उनका विचार था कि अकेले इतने सारे लोगों की सेवा करना मुश्किल होगा इसलिए वो अपने साथ और लोगों को जोड़ना चाहती थी.

उन्होंने अपने साथ संत मैरी स्कूल के शिक्षकों को अपने साथ जोड़ कर 1950 में मिशनरी ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की. धीरे धीरे और भी लोग इस संस्थान से जुड़ते गए.

यह वही समय था जब कलकत्ता में कुष्ठ रोग और प्लेग जैसी बीमारियां तेजी से फ़ैल रही थी. मदर टेरेसा अपनी संस्था के लोगों के साथ मिलकर बीमार लोगों का इलाज करती और लोगों को जागरूक करती.

वो लोगो को सदैव यह समझाने का प्रयास करती कि मनुष्य को कभी एक दूसरे के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए.

हमारे देश में छुआछूत, रंगभेद, जातिभेद जैसी विचारधारा भी लोगों के अंदर एक बीमारी की तरह थी जो कभी निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी.

मदर टेरेसा ने ऐसे लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया जिनका इस दुनिया में कोई नहीं था और वो गरीबी के शिकार थे. वो भारत तक ही सीमित नहीं रही बल्कि अपनी इस संस्था को विश्व स्तर तक फैलाने का विचार किया.

उन्होंने 1965 में भारत के बाहर वेनेजुएला में पहला मिशनरी ऑफ़ चैरिटी स्थापित किया और धीरे-धीरे 100 से भी ज्यादा देशों में सक्रीय हो गई.

मदर टेरेसा खुद भी किडनी और दिल की बीमारी से जूझ रही थी और कई बार दिल के दौरे भी पड़े. तबीयत खराब होते हुए भी वो लोगों की सेवा करने में सदैव आगे रहती.

एक समय ऐसा आया जब जो ज्यादा बीमार रहने लगी तब 1997 की शुरुआत में उन्होंने मिशनरी ऑफ़ चैरिटी संस्था के अध्यक्ष का पद छोड़ दिया.

5 सितम्बर 1997 को मदर टेरेसा की मृत्यु हो गई लेकिन इतिहास के पन्नों में उनका ये महान व्यक्तित्व हमेशा जीवित रहेगा.

निष्कर्ष

मदर टेरेसा का समाज के गरीब लोगों के लिए दिया गया योगदान हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है. भारतीय मूल की नहीं होने के बाद भी उन्होंने यहाँ के लोगों की सेवा की क्योंकि उनके लिए मानवता का धर्म सबसे पहले था.

इसलिए उन्हें मदर टेरेसा की उपाधि दी गयी. उनके कामों की पूरी दुनिया ने सराहना की. उनको 1962 में भारत सरकार के द्वारा पद्मश्री और 1980 में भारत रत्न से सम्मानित किया. 1985 में उनको निःस्वार्थ लोगों की सेवा करने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

हमें उनके जीवन से सीख लेनी चाहिए कि लोगों की सेवा करने के लिए किसी जाति, धर्म या रंग को नहीं देखा जाता बल्कि मानवता को देखा जाता है. इसी के साथ मैं आज का अपना भाषण यहीं समाप्त करता हूँ.       

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