रानी लक्ष्मी बाई पर निबंध

भारत को अंग्रेजो की गुलामी से आज़ादी दिलाने के लिए कई क्रान्तिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने प्राण त्याग दिए लेकिन अंग्रेजो के सामने कभी घुटने नहीं टेके.

स्वतंत्रता की इस लड़ाई में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जब भी ऐसी वीर महिलाओं की चर्चा होती है तो झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे पहले लिया जाता है.

रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजों से लोहा लिया और इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया. 

रानी लक्ष्मी बाई पर निबंध (Hindi Essay on Rani Laxmi Bai “Jhasi ki Rani”)

Hindi Essay on Rani Laxmi Bai

आज भी हमारी किताबों में रानी लक्ष्मी बाई की वीर गाथा का वर्णन मौजूद है. रानी लक्ष्मी बाई की गाथा इसलिए पढ़ाई जाती है ताकि आज की पीढ़ी लक्ष्मीबाई के जीवन से  प्रेरणा लें. 

इस लेख में रानी लक्ष्मीबाई पर निबंध लिखा गया है इस विषय पर हर कक्षा के विद्यार्थियों को परीक्षा में निबंध लिखने को कहा जाता है. यह निबंध आपके उपयोगी साबित होगा.

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म और शुरुआती जीवन   

रानी लक्ष्मी बाई बचपन से ही अपनी उम्र की अन्य बालिकाओं से हट कर खेल खेला करती थी वो घुड़सवारी, तीरन्दाजी, भालाफेंक और तलवारबाज़ी जैसी क्रीड़ा में अधिक रूचि रखती थी.

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में एक मराठा परिवार में हुआ था. मायके में उनका नाम मणिकर्णिका था जिसकी वजह से लोग उन्हें प्यार से मनु बुलाते थे.

उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे है वो बिठौर जिले के पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना में सेनापति थे इसलिए रानी लक्ष्मीबाई का पालन पोषण पेशवा बाजीराव की देख रेख में हुआ था .

लक्ष्मीबाई की माँ का नाम भागीरथी तांबे है जो बहुत ही धार्मिक और सभ्य विचार की महिला थी.

रानी लक्ष्मीबाई जब मात्र 4 वर्ष की थी तभी उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी. लक्ष्मीबाई को घर पर ही शिक्षा मिली इसलिए वो लिखना और पढ़ना भी जानती थी.

लक्ष्मीबाई ने अपने वीर होने का परिचय देते हुए एक बार  बाजीराव पेशवा के पुत्र नाना साहब पेशवा को घोड़े के पेरो से कुचलने से बचाया था.

नाना साहब पेशवा लक्ष्मीबाई को अपनी मुंहबोली बहन मानते थे और प्यार से उनको छबीली बुलाते थे.

1842 में जब लक्ष्मीबाई मात्र 14 वर्ष की थी तब उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ और शादी के बाद वो रानी लक्ष्मीबाई कहलाई.

शादी के नौ साल बाद रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 4 महीने के बाद उसकी मृत्यु हो गयी. 

1857 की क्रान्ति में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका

लक्ष्मीबाई के पुत्र की मृत्यु होने के बाद झाँसी के महाराजा गंगाधर राव पुत्र वियोग में बहुत उदास रहने लगे. झाँसी को एक उत्तराधिकारी की जरूरत थी इसलिए उन्होंने अपने भतीजे आनंद राव को गोद लिया और उसका नाम बदलकर दामोदर राव रख दिया.

1853 में महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी. उस दौरान अंग्रेजो के द्वारा राज्य हड़प निति चलाई जा रही थी.

झाँसी के राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने दामोदर राव को झाँसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया क्योंकि वो गंगाधर राव का पुत्र नहीं था.

अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई को एक पत्र लिखा जिसमें लक्ष्मीबाई को वार्षिक पेंशन देने के दावे के साथ झाँसी को छोड़ने का आदेश दिया. रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर  दिया. 

1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ से हो चुकी थी और रानी लक्ष्मीबाई ने भी झाँसी को बचाने के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने की ठान ली थी. 1858 में ब्रिटिश सेना ने सर ह्युज हेनरी रोज के नेतृत्व में झाँसी पर धावा बोल दिया.

लगभग दो हफ्तो तक झाँसी की सेना और अंग्रेजो के बीच युद्ध चला लेकिन अंत में झाँसी को हार का सामना करना पड़ा. रानी लक्ष्मीबाई को अपने पुत्र को पीठ पर बाँध कर घोड़े पर सवार होकर काल्पी में छिपना पड़ा.

उन्होंने तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारियों के साथ ग्वालियर के किले पर कब्ज़ा कर लिया.

रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु   

ग्वालियर की विद्रोही सेना के साथ रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी. युद्ध के मैदान में वो साड़ी पहनकर अपने दोनों हाथो में तलवार लेकर लड़ती थी.

लक्ष्मीबाई घोड़े की लगाम अपने मुँह में लिए अपने बेटे दामोदर को पीठ पीछे बांध कर लड़ती थी. लक्ष्मीबाई की मृत्यु को लेकर इतिहास में अलग-अलग तर्क मौजूद है.

कही पर गोली लगने से रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु का वर्णन है तो वही अंग्रेजो के इतिहास में कैप्टन ह्यूरोज की तलवार से मृत्यु का वर्णन है.

युद्ध के दौरान कैप्टन ह्यूरोज ने तलवार से लक्ष्मीबाई के सिर पर वार किया जिसके कारण उनके सिर में गहरी चोट लगी और तेजी से खून बहने लगा.

लक्ष्मीबाई के सैनिक उन्हें एक मंदिर में ले गए लेकिन उनको बचा नहीं पाए. लक्ष्मीबाई ने मंदिर में अंतिम सांस लेते हुए एक सैनिक को उनके पुत्र दामोदर राव को लेकर भाग जाने का आदेश दिया और कहा कि मृत्यु के बाद मेरा शरीर अंग्रेजो के हाथ नहीं लगना चाहिए.

उनकी मृत्यु के बाद सैनिकों के पहुंचने से पहले ही लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार कर दिया. इसी के साथ 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गयी लेकिन उनकी वीरता और शौर्य की कहानी इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गयी. 

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निष्कर्ष

रानी लक्ष्मी बाई ने भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम विद्रोह 1857 की क्रांति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. एक महिला होते हुए भी उनके अंदर युद्ध की सारी कला मौजूद थी.

उनकी आँखों में शत्रुओं से लोहा लेने की ज्वाला थी इसी लिए रानी लक्ष्मीबाई को मर्दानी कहा गया है. लक्ष्मीबाई का जीवन हर उस महिला को प्रेरणा देता है.

जो अपने आप को कमजोर और लाचार समझ लेती है. हमें भी उनके जीवन से बहुत कुछ सीखना चाहिए और किसी भी परिस्थिति हमेशा अपने देश के साथ खड़ा रहना चाहिए.