ज्वालामुखी पर निबंध | Essay on Volcanoes in Hindi

पृथ्वी की सतह के नीचे बहुत सी गतिविधियाँ होती रहती है और इनके परिणामस्वरूप पृथ्वी की सतह पर बहुत से बदलाव देखने को मिलते है ज्वालामुखी विस्फोट ऐसा ही एक उदाहरण है जो पृथ्वी की आंतरिक क्रियाओं के कारण उत्पन्न होता है. ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग जगहों पर देखने को मिलते है जो कभी-कभी बहुत भयंकर विस्फोटक होते है. ज्वालामुखी विस्फोट की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई देती है.

26 अगस्त 1883 को इण्डोनेशिया के क्रेकैटोआ में इतना भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था कि उसकी आवाज वहां से 4800 किलोमीटर दूर तक स्थित आस्ट्रिया तक सुनाई दी थी. कुछ ऐसे ज्वालामुखी भी होते है जो शांत किस्म के होते है जिनमे लावा अधिक निकलता है लेकिन गैस की मात्रा कम होती है. इस लेख में ज्वालामुखी पर निबन्ध लिखा गया है जो सभी विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है.   

Essay on Volcanoes in Hindi

ज्वालामुखी पर निबंध (Essay on Volcanoes Hindi)

ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर छेद या दरार है जिसके अन्दर से लावा और गैसें निकलती है.  अन्दर से निकलने वाला लावा सतह पर आने के बाद ठंडा होता जाता है और जमता जाता है. लावा आस पास जमने के कारण ज्वालामुखी एक पर्वत का रूप ले लेते है और जैसे-जैसे लावा की मात्रा बढ़ती जाती है पर्वत और बड़ा होता जाता है.   

भारत में भी दो प्रमुख ज्वालामुखी पाए गए है पहला ज्वालामुखी बेरन ज्वालामुखी है जो अंडमान द्वीपसमूह के मध्य अंडमान में स्थित बैरन द्वीप पर है और दूसरा ज्वालामुखी नारकोंडम ज्वालामुखी है जो अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के उत्तर अंडमान पर स्थित है. बैरन ज्वालामुखी सक्रीय प्रकार का ज्वालामुखी है वहीं नारकोंडम ज्वालामुखी निष्क्रिय प्रकार का ज्वालामुखी है.

सक्रीय ज्वालामुखी उन्हें कहा जाता है जिसके अंदर से लावा और गैस बाहर निकलती रहती है और अगर ज्वालामुखी से लावा व गैसें निकलना बंद हो जाती है तो उसे निष्क्रिय ज्वालामुखी कहा जाता है. निष्क्रिय ज्वालामुखी भविष्य में वापस सक्रीय भी हो सकते है. 

ज्वालामुखी कैसे बनता है?

पृथ्वी के आतंरिक भाग में बहुत सारे खनिज और चट्टानें पाई जाती है. भूतापीय ऊर्जा के कारण ये पदार्थ पिघलने लगते है इन पिघले हुए पदार्थों को मेग्मा कहा जाता है और पृथ्वी की सतह पर आने के बाद इसे लावा कहा जाता है. लावा पृथ्वी की सतह पर आने के बाद जमता जाता है और एक पहाड़ बन जाता है.

ज्वालामुखी विस्फोट एक प्राकृतिक क्रिया है और इसको नियंत्रित करना किसी के बस में नहीं है. बहुत सारे ज्वालामुखी विस्फोट इतने तीव्र होते है कि वो आस पास रहने वाले जीवों को नुकसान भी पहुँचा सकते है इसलिए इसके नजदीक इंसानी बस्तियाँ नहीं बसती. जमीन के नीचे तेज हलचल होने से भूस्खलन और बाढ़ आने की संभावना भी बढ़ जाती है.

ज्वालामुखी के प्रकार 

ज्वालामुखी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है – 

  1. सक्रीय ज्वालामुखी – सक्रीय ज्वालामुखी उस प्रकार के ज्वालामुखी होते है जिनमे कुछ समय के अन्तराल में हमेशा उदगार होता रहता है. उनके अंदर से लावा और गैसें निकलती रहती है. पूरे विश्वभर में 500 से अधिक सक्रीय ज्वालामुखी है और इनमे से आधे से ज्यादा रिंग ऑफ़ फायर का हिस्सा है.
  2. प्रसुप्त ज्वालामुखी – प्रसुप्त ज्वालामुखी ऐसे ज्वालामुखी होते है जिनमे  निकट समय में कोई विस्फोट नहीं हुआ लेकिन भविष्य में विस्फोट होने की सम्भावना हो सकती है. इनके अन्दर ही क्रियाएँ होती रहती है फ्युजियमा, क्राकाटोवा, विसुवियस इस प्रकार के ज्वालामुखी के कुछ उदाहरण है. 
  3. शान्त या मृत ज्वालामुखी – ऐसे ज्वालामुखी जिनमे हजारों वर्षों से उदगार नहीं हुआ हो और भविष्य में विस्फोट होनी की सम्भावना भी नहीं हो. मिनाको (हवाई द्वीप), चिम्बराजो (दक्षिण अमेरिका), पोपा (बर्मा),  किलीमिंजारो (अफ्रीका) मृत ज्वालामुखी के कुछ उदाहरण है.    

ज्वालामुखी विस्फोट के कारण    

पृथ्वी को जैसा दिखाया जाता है असल में वैसी नहीं है. यह ऊपर से समतल नहीं है बल्कि इसका आकार एक आलू के जैसा मान सकते है. यह अपनी सतह और कुछ गहराई तक ठण्डी व ठोस है लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी के केंद्र की और बढ़ते है इसका तापमान बढ़ने लगता है.

पृथ्वी के केंद्र का तापमान लगभग सूर्य की बाहरी परत के समान है. इतना अधिक तापमान होने के कारण यहाँ मौजूद खनिज, चट्टानें और अन्य पदार्थ तरल अवस्था में पाए जाते है. अधिक तापमान के कारण आंतरिक दबाव बढ़ने लगता है और ये तरल पदार्थ पृथ्वी की सतह को तोड़कर बाहर आ जाते है.

ज्वालामुखी के विस्फोट से लावा के साथ बहुत सी गैसों के बादल बनते हुए दिखाई देते है. ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में कार्बन डाइऑक्सइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, नाइट्रोजन, सल्फर डाइऑक्सइड, जलवाष्प आदि शामिल होते है. ज्वालामुखी विस्फोट ज़मीन के अलावा समुद्र और बर्फ वाली जगहों पर भी हो सकते है. 

ज्वालामुखी की तीव्रता मापने का पैमाना 

वर्ष 1982 में वीईआई इंडेक्स बनाया गया जो ज्वालामुखी की तीव्रता को मापने के उपयोग में लिया जाता है. इसका पैमाना ज़ीरो से आठ के बीच होता है. ज़ीरो से दो के बीच मापन वाले ज्वालामुखी निरन्तर विस्फोट होने वाले ज्वालामुखी होते है. पैमाने पर तीन अंक दर्शाने वाले ज्वालामुखी हर साल विस्फोट होते है और बहुत घातक भी होते है.       

पैमाने पर चार और पांच अंक दर्शाने वाले ज्वालामुखी एक सदी या दशक में एक बार ही विस्फोट करते है इनके अंदर से निकलने वाला लावा 25 किलोमीटर ऊँचाई तक जा सकता है. छः और साल पैमाने वाले ज्वालामुखी सुनामी और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देते है. आठ के पैमाने वाले ज्वालामुखी विस्फोट बहुत कम देखने को मिलते है. 

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निष्कर्ष – ज्वालामुखी हमारे सामने एक विनाशकारी छवि पेश करता है लेकिन पृथ्वी की सतह के 80 प्रतिशत हिस्से का निर्माण ज्वालामुखी विस्फोट के कारण ही माना जाता है. पृथ्वी पर मौजूद कई पहाड़ और पर्वत भी ज्वालामुखी विस्फोट का ही परिणाम है. ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी का वर्तमान वायुमंडल भी ज्वालामुखी विस्फोट के कारण निकलने वाली गैसों का ही परिणाम है.

भारत में पहला ज्वालामुखी विस्फोट ‘दालमा विस्फोट’ था जो लगभग तीन अरब साल पहले हुआ था जिसके अवशेष झारखण्ड राज्य के सिंघभूम क्षेत्र के ‘दालमा ट्रैम्प’ में आज भी देखने को मिलते है. समुद्र में ज्वालामुखी विस्फोट के परिणामस्वरूप ही द्वीप और टापू का निर्माण होता है हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर आदि में कई ज्वालामुखी विस्फोट से निर्मित द्वीप मौजूद है.

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